मुजफ्फरपुर की यह 13 साल की बेटी आज साबित कर रही है कि उम्र नहीं, हौसला और मेहनत मायने रखती है. जब आराध्या मैदान में उतरती हैं, तो हर नजर सिर्फ उन्हीं पर टिक जाती है. मात्र 4 साल की उम्र में बल्ला थामने वाली आराध्या ने अपनी बल्लेबाजी सबको हैरान कर रखा है. जब वह खेलती हैं तो लोग रुक रुककर मैच देखते हैं.
आराध्या का हर शॉट ताकत और तकनीक का शानदार मेल होता है. कवर ड्राइव हो या पुल शॉट, गेंद जब उनके बल्ले से निकलती है तो दर्शक कुछ पल के लिए देखते ही रह जाते हैं. कई बार तो ऐसा होता है कि शॉट लगते ही तालियों की गूंज पूरे ग्राउंड में फैल जाती है. कम उम्र में इतनी परिपक्व बल्लेबाजी ने आराध्या को क्रिकेट प्रेमियों का फेवरेट बना दिया है.
4 साल की उम्र में थामा बल्ला
आराध्या सिर्फ बल्लेबाजी तक सीमित नहीं हैं. वह बेहतरीन विकेटकीपर भी हैं. विकेट के पीछे उनकी फुर्ती, तेज रिफ्लेक्स और सही समय पर लिया गया कैच उनके खेल को और खास बना देता है. यही वजह है कि वह आज बिहार अंडर-15 वुमेन क्रिकेट टीम की कप्तान हैं. कप्तानी के दौरान भी वह मैदान पर शांत रहती हैं और टीम को आगे बढ़ने का हौसला देती हैं.
क्रिकेट के प्रति आराध्या का जुनून बचपन से ही रहा है. जब वह सिर्फ 4 साल की थीं, तभी से बल्ला हाथ में थाम लिया था. स्कूल के शिक्षक जायसवाल सर ने उनकी प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना और उन्हें क्रिकेट की दुनिया से परिचित कराया. इसके बाद आराध्या ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
टूर्नामेंट में खींचा सबका ध्यान
आराध्या अपने आदर्श के रूप में महेंद्र सिंह धोनी को मानती हैं. धोनी की तरह ही वह विकेटकीपर-बल्लेबाज बनकर टीम की रीढ़ बनना चाहती हैं. हाल ही में केरल में हुए अंडर-15 स्टेट लेवल टूर्नामेंट में उन्होंने बिहार टीम की कप्तानी की, जहां पांच राज्यों की टीमों के खिलाफ मुकाबले हुए. इस टूर्नामेंट में भी उनके खेल ने सबका ध्यान खींचा.
आराध्या के पिता आशुतोष कुमार एक निजी स्कूल में शिक्षक हैं, जबकि मां गृहिणी हैं. पिता कहते हैं, ‘जब आराध्या ग्राउंड में खेलती है और लोग उसके शॉट्स के फैन बनते हैं, तो हमें गर्व महसूस होता है. हमारा सपना है कि वह एक दिन भारत के लिए खेले.’
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